Teji bachhan: तेजी और हरिवंश राय बच्चन को एक ही गीत ने कैसे जीवन साथी बना दिया, जानें पूरा किस्सा

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हाइलाइट्स

कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में बहुत ही अच्छे से लिखी है सारी कहानी
‘मधुशाला’ से कम आनंद नहीं देती है उनकी आत्मकथा, चार खंडों में है
“नीड़ का निर्माण फिर” में तेजी बच्चन से मिलने और शादी का पूरा वर्णन है

मधुशाला के अमर गायक हरिवंश राय बच्चन की पत्नी और बेजोड़ फिल्म कलाकार अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachhan) की माताजी तेजी बच्चन खुद भी एक अच्छी अध्यापिका थीं. हिंदी के अद्वितीय कवि और लेखक हरिवंश राय ने जिस तरह से तेजी बच्चन का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है, उससे पता चलता है कि वे कितनी संवेदनशील, बिदुषी और आधुनिक थी. चालीस के दशक में जब रीति-रिवाज के बंधन में जकड़ा था, तब भी तेजी बच्चन ने परंपरागत तरीके से शादी करने की जगह कोर्ट में जाकर सिविल मैरिज की. जबकि इनके पिता खजान सिंह चाह रहे थे कि जैसा होता है उस तरह बारात आए और वे बेटी को विदा करें.

इलाहाबाद में 24 जनवरी को 1942 को मजिस्ट्रेट के समक्ष शादी करने के बाद हरिवंश राय बच्चन की माता जी ने जरूर घर में अपने हिसाब से कुछ कर्मकांड किए. शादी की दावत भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लॉन में आयोजित की गई. हालांकि उनके बहुत से रिश्तेदार इस दावत में शामिल नहीं हुए. वैसे ये तो सभी को पता है कि बच्चन विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक थे. तेजी भी शादी से पहले लाहौर के कॉलेज में साइकोलॉजी की प्राध्यापिका थीं.

कहीं फंसाने को तो मेरे, नहीं बिछाया जाता जाल

तेजी और हरिवंश राय बच्चन की मुलाकात बहुत ही दिलचस्प तरीके से हुई थी. पहली पत्नी श्यामा और पिता के निधन के बीच हरिवंश राय का रुझान एक आइरिश महिला की ओर हो गया, लेकिन आइरिश महिला से बात नहीं बनी. हरिवंश राय बच्चन को अपनी परेशानियों उलझा देख उनके बरेली के एक मित्र प्रकाश जौहरी ने उन्हें अपने घर बरेली बुलाया. बच्चन जी हिंदी साहित्य सम्मेलन की सभा में पंजाब गए हुए थे. वहां टेलीग्राम यानी तार भेज कर प्रकाश ने बच्चन साहब को बुलाया. बाद में इस संयोग को समझ कर बच्चन जी ने लिखा –

इसीलिए सौंदर्य देखकर

शंका यह उठती तत्काल

कहीं फंसाने को तो मेरे

नहीं बिछाया जाता जाल

गीत जिसने दोनों को जोड़ दिया
वैसे इस ओर हरिवंश राय बच्चन का ध्यान बाद में ही गया. पहले तो वे सहज भाव से सम्मेलन का काम खत्म कर बरेली पहुंच गए. वहां उनकी मुलाकात तेजी सूरी से होती है. तेजी प्रकाश जौहरी की पत्नी के साथ ही कॉलेज में पढ़ाती थीं. रात में भोजन और किसी कार्यक्रम से लौटने के बाद प्रकाश जौहरी के परिवार ने बच्चन जी से गीतों की फरमाइश की. दिसंबर की आखिरी रात थी. परिवार चाह रहा था कि नया साल गीतों के साथ आए. उस वक्त तक हरिवंश राय एक कवि के रूप में मशहूर हो चुके थे. बच्चन के उस वक्त की व्यथा गीतों से फूट पड़ी –

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी ?

क्या करुं?

मैं दुखी जब जब हुआ

संवेदना तुमने दिखाई

मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा

रीति दोनो ने निभाई

किंतु इस आभार का अब

हो उठा है बोझ भारी

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी ?

क्या करुं ?

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा सीरीज की किताब ‘नीड़ का निर्माण फिर’ की पृष्ठ संख्या 236 -237 में इस गीत के साथ अपने इस दुःख का कारण भी लिखा है. लिखते हैं कि महीनों से संवेदना-संवेदना सुनते वे ऊब गए थे. उनका संकेत पिता की मृत्यु के बाद के दुःख से है. उसी ‘सिनिकल मूड’ में ये गीत उन्होंने लिखा था. फिर इसका अगला पद भी सुनाया-

एक भी उच्छवास मेरा

हो सका किस दिन तुम्हारा

उस नयन में बह सकी कब

इस नयन की अश्रुधारा

सत्य को मूंदे रहेगी

शब्द की कब तक पिटारी?

क्या करुं ?

संवेदना लेकर तुम्हारी ?

क्या करुं?

बच्चन जी लिखते हैं, गीत और उसके संदर्भ को समझने वाला पूरा परिवार गीत पर रो पड़ा. लेकिन गहरी संवेदना वाली तेजी के आंसुओं से वे भी भीग गए. इस नयन की अश्रुधारा ‘उस’ नयन से भी बह चली थी. इसी पेज पर वे लिखते हैं – “… और हम आंसुओं के चश्मे में नहा कर क्या हो गए. चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी बन कर प्रवेश किया था और चौबीस घंटे बाद जीवन साथी ( पति-पत्नी नहीं ) बन कर निकल रहे हैं.”

पंत जी की भविष्यवाणी

यहीं पर उन्होंने पंत जी ( सुमित्रा नंदन पंत) की भविष्यवाणी को भी याद किया है. ये भविष्यवाणी उन्होंने इलाहाबाद से पहाड़ों की जाने से पहले मार्च में की थी –“ बच्चन, विवाह तो तुम्हारा हुआ ही नहीं. वह अब होगा और इसी वर्ष की समाप्ति तक.” ध्यान रखने वाली बात है कि पहली पत्नी श्यामा से हरिवंश राय का प्रेम तो बहुत था, लेकिन दोनों लोग मिल नहीं पाते थे. पहली पत्नी को टीबी का रोग था और माता जी इस बात का पूरा ध्यान रखती थी कि वे श्यामा से मिल कर इस रोग का शिकार न हो जाए. श्यामा को इसी रोग ने निगल ही लिया.

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बहरहाल, प्रकाश जौहरी ने नए साल के पहले दिन ही, अपने छोटे बेटे से, नव युगल को माला पहनवा सगाई की घोषणा कर दी. यही नहीं अखबार वालों को भी सूचना दे दी. वहीं तय हुआ कि दोनों लोग सिविल मैरिज करेंगे. तेजी के पिता सरदार खजान सिंह विलायत से बैरिस्टरी पढ़ कर आए थे और राजा पटियाला के यहां मंत्री के तौर पर काम कर रहे थे. बहुत इज्जत थी. फिर भी युगल ने सिविल मैरिज करना तय किया.

‘हनीमून’

हरिवंश राय बच्चन ने उस दौर में अपने हनीमून के बारे में भी लिखा है. बच्चन जी के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष अमर नाथ झा ने उसी साल गर्मियों की छुट्टी में दोनों को पहाड़ में मसूरी आने का आमंत्रण दिया. ‘नीड़ का निर्माण फिर’ की पृष्ठ संख्या 276-277 पर वे लिखते हैं- “ विवाह के बाद लोग हनीमून के लिए बाहर जाते हैं. हम तो कहीं जा नहीं सके थे; हमने सोचा, चलो, गो कुछ बिलंब से हनीमून होगी. ” मसूरी जाकर ये युगल झा साहब के यहां रहा तो लेकिन झा साहब का औपचारिक और अफसरों जैसा अंदाज इन्हें नहीं भाया. कुछ दिन रहने के बाद जब ये लोग रिक्शे पर लौट रहे थे, तो इसी किताब की पृष्ठ संख्या 279 पर लिखते हैं- “लिनवुड कॉटेज से ऊपर सड़क पर जाकर, जब हम रिक्शे में बैठे तो पहला वाक्य जो तेजी ने कहा वह था – Breathe free air though hot – आजाद हवा में सांस लो, भले ही वो गर्म क्यों न हो. इतना कह कर उन्होंने दो तीन लंबी सांसे खींची. मैंने भी उनका साथ दिया, और हम दोनों इतनी जोरों से हंसे कि नीचे झा साहब ने निश्चय सुना होगा- डेढ़ महीने में पहली बार हमारा ऐसा मुक्त हास.”

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